महंगाई से परेशान आम आदमी के लिए अब अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में पढ़ाना मुश्किल होता जा रहा है। आज के वक्त में अगर आप अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा दिलाना चाहते हैं तो यह काम किसी बड़े सपने से कम नहीं है। प्राइवेट स्कूलों की फीस, किताबें, यूनिफार्म और दूसरे खर्च मिलाकर एक ऐसा जाल बुन रहे हैं जिसमें मिडिल क्लास परिवार बुरी तरह फंस रहा है। प्राइवेट स्कूलों की फीस आम आदमी को बेहाल कर रही है। हाल यह है कि एक बच्चे को प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने के लिए लोगो को लाखों रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं।
किस तरह से प्राइवेट स्कूलों की फीस बढ़ती जा रही है। एक बच्चे को पढ़ाने में कितने रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं? आइए आंकड़ों के साथ आपको बताते हैं यह पूरा गणित क्या है और यह मिडिल क्लास को कैसे बेहाल कर रहा है।
आज के वक्त में एजुकेशन घर बनवाने जितनी ही महंगी हो गई है। खासकर अगर हम प्राइवेट स्कूलों की बात करें तो मिडिल क्लास की कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा यहीं चला जाता है। हर साल बढ़ती फीस, किताबों का खर्च, ड्रेस का बोझ यह सब मिलाकर मध्यम वर्ग को एक ऐसे आर्थिक दलदल में धकेल रहे हैं जहां से निकलना मुश्किल होता जा रहा है।
दिल्ली के एक चार्टर्ड अकाउंटेंट मीनल गोयल ने कुछ चौंकाने वाले आंकड़े सामने रखे हैं जो इस पूरे गणित को समझाते हैं। हम जिस भारी भरकम खर्च को बच्चे के भविष्य सुधारने के लिए उठा रहे हैं। क्या वाकई हमें उसका सही मूल्य मिल रहा है? यह एक बड़ा सवाल है।
स्कूल फीस के लिए EMI
आजकल महंगी चीजें खरीदनी हो या बच्चों को प्राइवेट स्कूल में पढ़ाना हो सब कुछ आसान हो गया है। कैसे? ईएमआई और लोन की सुविधा से। यह स्कूल या फिनटेक स्टार्टअप कोई छूट नहीं देते बल्कि फीस भरने को आसान बनाते हैं। जी हां, कई बड़े स्कूलों ने तो फीस पेमेंट के लिए ईएमआई जैसी सुविधाएं भी शुरू कर दी हैं। इसका नतीजा यह होता है कि मिडिल क्लास को अक्सर अपनी मोटी फीस भरने के लिए लोन लेना पड़ता है और वह इस कर्ज के जाल में फंसता चला जाता है। एक लोन से दूसरे लोन की ओर बढ़ता यह सिलसिला परिवार की आर्थिक कमर तोड़ रहा है।
सालाना इनकम का 40 से 80% हिस्सा पढ़ाई पर खर्च
सीए मीनल गोयल ने सोशल मीडिया पर की गई अपनी पोस्ट में बताया कि भारत में स्कूली शिक्षा अब सिर्फ पढ़ाई तक सीमित नहीं रह गई है। बल्कि यह चुपचाप एक बहुत बड़े खर्च में बदल गई है। यह खर्च मिडिल क्लास की कमाई का एक बड़ा हिस्सा निगल जाता है। आंकड़े बताते हैं कि एक अभिभावक की सालाना इनकम का 40 से 80% हिस्सा तक बच्चों की पढ़ाई पर खर्च हो रहा है। यह आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं। मीनल गोयल ने जो आंकड़े शेयर किए हैं, वह अगर एक साथ देखें तो वाकई चौंकाने वाली तस्वीर सामने आती है।
एक बच्चे की शिक्षा का खर्च साल का ₹3.5 लाख
अगर आपका बच्चा किसी अच्छे प्राइवेट स्कूल में पढ़ता है, तो आप इन आंकड़ों को आसानी से समझ पाएंगे। एडमिशन फीस करीब ₹35,000 ट्यूशन फीस करीब 1.4 लाख एनुअल चार्ज करीब ₹38,000 ट्रांसपोर्ट चार्ज ₹44,000 से ₹73,000 तक किताबें और यूनिफार्म ₹20000 से ₹30000 तक अगर इन सबको जोड़ दें तो एक बच्चे की शिक्षा पर ही सालाना खर्च आसानी से ₹2.5 लाख से ₹3.5 लाख तक पहुंच जाता है।
यह तो औसत स्कूल का आंकड़ा है। बड़े शहरों में कई प्रतिष्ठित स्कूल तो ऐसे भी जहां प्रति बच्चे का सालाना खर्च ₹4 लाख से भी ज्यादा हो जाता है। यहां तक कि मध्यम स्तर के स्कूलों में भी अब सालाना ₹1 लाख से ₹1.5 लाख तक का खर्चा आ जाता है और यह तो औसत स्कूलों की बात है। अगर आपका बच्चा किसी बड़े स्कूल में पढ़ता है तो यह खर्च का बोझ और भी बढ़ जाता है।
किताबें, यूनिफार्म, जूते भी स्कूल से ही खरीदने की मजबूरी
लेकिन बात भी खत्म नहीं होती। प्राइवेट स्कूलों में सिर्फ फीस ही नहीं बल्कि किताबें, यूनिफार्म, जूते और दूसरी चीजें भी स्कूल से ही खरीदने की मजबूरी होती है। रिपोर्ट्स बताती हैं यह सामान बाजार से कई गुना महंगे दामों पर बिकता है। इतना ही नहीं कई स्कूलों ने तो फीस भरने के लिए ईएमआई की सुविधा भी शुरू कर दी है। इसकी वजह से कई माता-पिता को लोन लेना पड़ता है। यह लोन बाद में कर्ज के जाल में फंसाने का काम करता है।
मिडिल क्लास परिवार जो अपने बच्चों को बेहतर भविष्य के लिए हर संभव कोशिश करता है, इस बोझ तले दबता जा रहा है। जानकारों का कहना है जैसे-जैसे फीस हर साल बढ़ती जाएगी, अभिभावकों पर दबाव भी बढ़ता जाएगा। सवाल यह है कि क्या लोगों को इस खर्च का सही मूल्य मिल रहा है?


